Water Harvesting

Water Harvesting

STORING RAINDROPS FOR RESUSCITATIONSTORING RAINDROPS FOR RESUSCITATIONIn the summers of 2002, Dr. Vibha Gupta met the women from Girad village of Samudrapur block, Wardha, who informed about the acute water crisis in their village. In addition, they explained how a mass exodus from the adjoining three water-scarce villages has aggravated their crisis. On reaching Girad, she found that the wells were drying. Ugly fights and violence at water sources ended in police station. The local farmers were undergoing a terrible economic crisis as 80 percent farmers were reeling under heavy debts taken for purchasing chemical farm inputs.
In search of water, tigers from the adjoining forest moved down to these villages. Outside villages refused to marry their daughters to men of these villages; and liquor booths were outnumbering food stalls. The famous pilgrimage – Farid Baba Dargah – annually attracted 15-20 lakh pilgrims, whose water needs also added to this water crisis.
With the help of the local community, MSS led an anti-liquor campaign and succeeded in banning its sale. Then, a detailed watershed action plan was prepared and CAPART agreed to fund it.
In three years, watershed structures and 36,000 new trees planted by community started showing results. The level of groundwater and well-water in the village rose by 5-6 feet. Initially during summers, these villages were supplied 2.4 crore litres of drinking water through water tankers, costing Ten Lakh rupees. Now a regular supply of tap water has replaced these water tankers.

  CONSERVING PRESERVING SOIL EROSIONCurrently, seven community ponds and 50 farm ponds provide irrigation to 1,000 farmers. Farm bunds and drains brought 200-acre additional land under cultivation. A total of 5602 Metric Ton soil is also saved from erosion. MSS conserved a total watershed area of 2500 hectares. It has constructed 36 kilometre long Continuous Contour Trenches (CCTs) to check rainwater from flowing down the Girad Tekri ( or hillock) over which is situated the Farid Baba Dargah. It has succeeded in conserving 9000 cubic metres of water during every monsoon by constructing Gulley Plugs, CCT stone bunds and several other measures to catch every raindrop falling on the hillock.
To prevent farmers from polluting and misusing water , Natural Farming wAS introduced to local farmers. These farmers use no chemicals, optimally utilize water, show noticeable rise in productivity and have saved the expenditure on chemical farm inputs, amounting to nearly 2.5 crore rupees.

सृजनशीलता का खजाना

सृजनशीलता का खजाना

मगन संग्रहालय समिति मुख्य रूप से एक ऐतिहासिक संग्रहालय चलाती है। इस संग्रहालय में विभिन्न प्रकार के ग्रामोद्योगों व खादी का सदियों पुराना इतिहास दर्शाया गया है। इसके ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभाग में ग्राम आधारित, कम लागत वाली, पर्यावरण के अनुकूल और ऊर्जा व पानी का संरक्षण करने वाली 18 प्रौद्योगिकियों की झांकी प्रस्तुत की गई है। देश की स्वाधीनता की लड़ाई में महात्मा गांधी के प्रमुख सिद्धांत यदि सत्य और अहिंसा थे तो प्रमुख हथियार थे खादी और ग्रामोद्योग। महात्मा गाँधी अंग्रेजों से ज्यादा अंग्रेजी व्यवस्थाओं, सभ्यता व संस्कृति से आजादी चाहते थे। दुर्भाग्यवश स्वाधीनता के बाद गांधी के नामलेवा नेताओं व सरकारों ने खादी व ग्रामोद्योग को विकास में बाधक मानते हुए पूरी तरह उपेक्षित कर दिया। खादी और ग्रामोद्योग विभाग होने के बावजूद सरकार का मुख्य ध्यान मशीनीकरण व भारी औद्योगीकरण पर ही केंद्रित रहा। ग्राम की बजाए शहरों को विकास का केंद्र बनाया गया। आज स्थिति यह हो गई है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी की दौड़ में खादी और गांव के कुटीर उद्योग-धंधों व कारीगरों को पिछड़ा समझा जाता है। ऐसे में यह जानकर किसी को अजीब लग सकता है कि 1938 में महात्मा गांधी ने जिस पहले खादी व ग्रामोद्योग संग्रहालय की स्थापना की, उसका नाम एक ग्रामीण वैज्ञानिक मगनलाल गांधी के नाम पर रखा था और उसके विकास में अपना जीवन खपाने वाले व्यक्ति डा. देवेंद्र कुमार एक युवा तेल प्रौद्योगिकीविद् थे।

मगन संग्रहालय खादी व ग्रामोद्योग का पहला संग्रहालय था। महात्मा गांधी इसे ग्रामोद्योगों की एक जीवंत झांकी बनाना चाहते थे जहां उत्पादन की ऐसी नई पद्धतियां विकसित की जाएं जिनसे भारत के गरीब लोगों का जीवन स्तर सुधारा जा सके। 1949 में डा. देवेंद्र कुमार ने एक वैज्ञानिक के रूप में अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ में कार्य करते हुए विज्ञान प्रौद्योगिकी के बल पर गरीबी की रेखा के नीचे रह रहे लोगों की सहायता के लिए इस रचनात्मक आंदोलन को बल दिया। 1978 में देवेंद्र भाई ने मगन संग्रहालय को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। उन्होंने इसके माध्यम से देश भर में विविध क्षेत्रों में कार्यरत वैज्ञानिकों, प्रौद्योगिकीविदों, अर्थशास्त्रियों व अन्य विशेषज्ञों में महात्मा गांधी के मूल्यों के प्रति नई चेतना जागृत करने की कोशिश की।

मगन संग्रहालय समिति का मूल उद्देश्य ग्रामीण कारीगरों के पारंपरिक ज्ञान पर आधारित देशज कौशल को उभारना और नवीनतम विज्ञान व प्रौद्योगिकी के साथ उसका सामंजस्य बिठाते हुए ऐसी नई प्रौद्योगिकी व तकनीकें विकसित करना है जिससे स्थानीय स्तर पर ग्रामीणों को उद्यम या व्यवसाय के स्थाई अवसर उपलब्ध कराए जा सकें। इसके अतिरिक्त खादी ग्रामोद्योग, कृषि व डेयरी आदि पर शोध, विकास व प्रचार कार्य और उत्पादन पद्धतियों का प्रदर्शन करना भी समिति के उद्देश्य हैं।

देवेंद्र भाई ने मगन संग्रहालय में ‘ग्रामोपयोगी विज्ञान केंद्र’ की स्थापना की। दृढ़निष्ठ व संकल्पित वैज्ञानिकों व तकनीकविदों के अपने दल के कारण इस केंद्र ने ऐसी 75 प्रौद्योगिकियां विकासित कीं, जिन्होंने ग्रामीणजन को व्यवसाय के अवसर प्रदान किए। साथ ही संस्था ने 30,000 सस्ते मगर टिकाऊ व पर्यावरणनुकूल मिट्टी के घर, 10,000 स्वच्छ शौचालय तथा 20,000 गोबर गैस संयंत्रें का निर्माण किया। इसी के साथ लगभग 30, 000 ग्रामीण कारीगरों को उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया। देवेंद्र भाई ने मगन संग्रहालय समिति द्वारा ग्रामीण व स्थानीय कारीगरों का एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू किया जिसका नाम है कारीगर पंचायत। इस आंदोलन के तहत देश के कुल 22 राज्यों में कारीगर संघ बनाए गए हैं, जिससे दो लाख से भी ज्यादा कारीगर जुड़े हुए हैं।

मगन संग्रहालय समिति मुख्य रूप से एक ऐतिहासिक संग्रहालय चलाती है। इस संग्रहालय में विभिन्न प्रकार के ग्रामोद्योगों व खादी का सदियों पुराना इतिहास दर्शाया गया है। इसके ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभाग में ग्राम आधारित, कम लागत वाली, पर्यावरण के अनुकूल और ऊर्जा व पानी का संरक्षण करने वाली 18 प्रौद्योगिकियों की झांकी प्रस्तुत की गई है। महात्मा गांधी प्रभाग में महात्मा गांधी के दैनिक प्रयोग की वस्तुओं और उन्हें भेंट में मिली सामग्रियों का संकलन है। महात्मा गांधी पर ही यहां एक चित्र प्रदर्शनी भी है जो सेवाग्राम के सहयोग से चलाई जा रही है। समिति द्वारा वर्ष में एक बार संग्रहालय में ‘वर्धा-वर्धन’ नामक सप्ताह भर का मेला आयोजित किया जाता है। यहां जैविक, पर्यावरणानुकूल और स्थानीय ग्रामोद्योगों के उत्पादों की हाट लगती है। इस मेले में स्वयंसेवी संगठन, सक्रिय समूह, किसान और ग्रामीण कारीगर व कलाकार अपने शिल्प व कौशल का प्रदर्शन करते हैं तथा अपने उत्पादों की बिक्री भी। वर्धा-वर्धन आम जनता को वैकल्पिक जीवन शैली, पर्यावरणानुकूल उत्पादों, विचारों व प्रकृति संरक्षण की पद्धतियों को जानने के लिए एक अवसर प्रदान करता है और उन लोगों से मिलने का भी मौका देता है जो नए विकल्पों की खोज में अग्रणी रहे हैं। वर्ष 2004 व 2005 में 22 राज्यों के 150 संगठनों ने इसमें सहभागिता की थी।

मगन संग्रहालय समिति का दूसरा अनूठा प्रयास है कारीगर पंचायतों के रूप में कारीगर आंदोलन। आधुनिक विज्ञान व तकनीकी ने स्थानीय व ग्रामीण कारीगरों को किस प्रकार बेरोजगार व भूखे मरने पर मजबूर कर दिया है, यह आज किसी से नहीं छिपा है। मिट्टी के कुल्हड़ों को प्लास्टिक के ग्लासों ने विस्थापित कर दिया और देश के लाखों कुम्हार एक साथ बेरोजगार हो गए। कुछ ऐसी ही स्थिति महाराष्ट्र में भी थी। महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी पर गणपति की पूजा बड़ी धूमधाम से की जाती है और इस अवसर पर लाखों मूर्तियां खरीदी व बेची जाती हैं। परंतु पिछले एक दशक से गणपति की मिट्टी से बनी मूर्तियों का स्थान ‘प्लास्टर आफ पेरिस’ से बनी मूर्तियों ने ले लिया था। इन मूर्तियों का उपयोग सरल था। ये हल्की व सस्ती भी थीं परंतु इससे वे नदियां व तालाब प्रदूषित हो रहे थे, जहां इन्हें विसर्जित किया जाता था और इनके कारण स्थानीय व पारंपरिक कुम्हार बेरोजगार हो गए थे। केवल वर्धा में ही ऐसे 200 कुम्हार भूखे मरने की कागार पर पहुंच गए थे। ऐसी परिस्थिति में समिति ने कारीगर पंचायत के माध्यम से जन जागृति फैलाई।

मंहगे हाइब्रिड बीज, रासायनिक खाद व कीटनाशक खरीदने में किसान धीरे-धीरे कंगाल होते गए और आत्महत्या को विवश हो गए। समिति ने किसानों को लगभग शून्य लागत वाली जैविक व प्राकृतिक खेती की नई तकनीकों से परिचय कराया। इसका लाभ वहां के 2000 से अधिक किसानों को मिला। वर्तमान में वहां 700 एकड़ खेत में प्राकृतिक खेती हो रही है।

उनके निरंतर व अथक परिश्रम से आज वर्धा में प्लास्टर आफ पेरिस की मूर्तियों का उपयोग बंद हो गया है और 200 कुम्हारों का जीवन बच गया। इसके साथ ही कारीगर पंचायत देश भर में कारीगरों की दशा सुधारने, उनका जीवन स्तर ऊपर उठाने और उन्हें नई व पर्यावरणानुकूल प्रौद्योगिकी से लैस करने में जुटा हुआ है। मगन संग्रहालय ने अनेक प्रौद्योगिकियां विकसित की हैं। जैसे समिति ने मोटा सूत काटने वालों की उत्पादकता व आमदनी बढ़ाने के लिए एक चार तकुए वाला उन्नत चरखा विकसित किया है जिसका नाम मगन चरखा रखा गया है। इन चरखों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मंहगे ‘तोपर्म’ के बदले देशी ‘तोपर्म’ लगाया गया है जिसे न केवल स्थानीय स्तर पर बनाना आसान है, बल्कि जिसकी मरम्मत कोई भी ग्रामीण कारीगर आसानी से कर सकता है। इस मगन चरखे से चार गुना अधिक उत्पादन होता है और चौगुनी कमाई भी। इसी प्रकार समिति ने पर्यावरण संरक्षण व जैव अनुकूल वन्य कपड़े के प्रयोग को प्रोत्साहन देने के लिए रासायनिक रंगों के विकल्प के रूप में 200 रंगों की जैविक डाई तैयार की है। इसमें से अधिकांश रंग स्थानीय वन उत्पादों आम, पलाश, बेहड़ा, बित्त आदि से बनते हैं। इसी प्रकार ब्लाक प्रिंटिंग का भी एक सस्ता पर्यावरणानुकूल विकल्प विकसित किया गया है। इस अभिनव छपाई तकनीक में ताजे हरे पत्तों का प्रयोग किया जाता है और इस तकनीक में केवल एक पत्ते से एक डिजाइन को न्यूनतम 200 बार कपड़े पर छापा जा सकता है।

समिति ने एक और अभिनव प्रयास निजी शौचालयों के क्षेत्र में किया। वर्धा जिले के भवानपुर गांव में 100 परिवार हैं। दो वर्ष पहले तक अन्य गांवों की तरह इस गांव में भी साफ-सफाई की स्थिति काफी दयनीय थी और ग्रामीण लोग शौच हेतु गांव की सड़कों पर निकल जाते थे। समिति ने गांव में कई बैठकें कीं और सभी परिवारों को एक शौचालय व स्नानघर का सेट बनाने के लिए तैयार कर लिया। प्रत्येक परिवार ने हजार रुपए प्रति परिवार के हिसाब से कुल एक लाख रुपए स्टेट बैंक आफ इंडिया की स्थानीय शाखा में जमा किए ताकि उन्हें दस लाख रुपए का कर्ज मिल सके। यह कर्ज 11 प्रतिशत ब्याज पर दिया गया और इसका भुगतान 7 वर्ष में करना है। मगन संग्रहालय समिति के स्थानीय कार्यकर्ताओं व राजमिस्त्रियों को उड़ीसा की ‘ग्राम विकास संस्था’ ने शौचालय निर्माण का प्रशिक्षण दिया। पचास परिवारों ने बैंक से कर्ज लिया और समिति ने उनके लिए शौचालय व स्नानगृह के सेट बनाए। इस प्रकार पहली बार बिना सरकारी सहायता के ग्रामवासियों ने स्वयं अपने संसाधनों से स्वच्छ शौचालय व स्नानघर बनाए।

एक अन्य अभिनव प्रयास के तहत समिति ने वर्धा जिले के सेल और समुद्रपुर प्रखंड के 100 गांवों की महिलाओं में जागृति फैलाई और 600 स्वयंसेवी समूह बनाने के लिए प्रेरित किया। इनमें से अधिकांश औरतें खेतीहर मजदूर, दिहाड़ी वाली या शारीरिक श्रम करने वाली हैं। इनमें से अधिकांश गरीबी रेखा के नीचे हैं। समिति के प्रयास, जागृति और प्रशिक्षणों का ही परिणाम हैं कि आज 12 स्वयंसेवी समूहों की औरतें सरपंच, ग्राम पंचायत सदस्य व जिला परिषद की सदस्य चुनी गई हैं। केवल चार वर्ष में ही इन स्वयंसेवी समूहों की मामूली बचत राशि कई गुना बढ़ चुकी है और 15 बैंकों में उनकी कुल बचत राशि है एक करोड़ पैंसठ हजार रुपए और उनका कुल आर्थिक लेन-देन पांच हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर चुका है। समिति ने 760 महिला स्वयंसेवी समूहों की सदस्याओं को राष्ट्रीय स्तर के 50 तकनीकी संस्थानों में प्रशिक्षण दिलवाया। इसके परिणाम-स्वरूप 30 गांवों में 34 नई उद्यम इकाइयों की स्थापना की गइ। इनमें जैविक खाद, जड़ी-बूटियों से कीटनाशक, केले का रेशा, धूप में सुखाए खाद्य उत्पाद, सोयाबीन उत्पाद, मसाले, झाडू, दुग्ध चाकलेट, लकड़ी के खिलौने, दैनिक उपयोग की सामग्री, साबुन, कपड़े धोने का पाउडर, नील, फिनाइल, फर्नीचर, कृषि कचड़े से निर्मित ईंटें, कागज उत्पाद आदि सैकड़ों वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है। इनमें अभी 875 ग्रामीण औरतों को सहायक रोजगार मिला हुआ है।

समिति ने जैविक खेती के क्षेत्र में भी काम किया। समिति का कार्यक्षेत्र वर्धा है जो महाराष्ट्र के उस विदर्भ क्षेत्र में आता है जहां पिछले वर्ष आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या सर्वाधिक थी। मंहगे हाइब्रिड बीज, रासायनिक खाद व कीटनाशक खरीदने में किसान धीरे-धीरे कंगाल होते गए और आत्महत्या को विवश हो गए। समिति ने किसानों को लगभग शून्य लागत वाली जैविक व प्राकृतिक खेती की नई तकनीकों से परिचय कराया। इसका लाभ वहां के 2000 से अधिक किसानों को मिला। वर्तमान में वहां 700 एकड़ खेत में प्राकृतिक खेती हो रही है।

अब समिति ने एक बैल चालित पंप लगाया है। इसकी क्षमता तीन हार्सपावर प्रति घंटा है और 30 फीट की गहराई से 12000 लीटर पानी खींचता है। इस पंप में आठ फव्वारे चलते हैं जो पूरा खेत सींच देते हैं। इस पंप से कुट्टी काटने की मशीन या आटा चक्की जैसी अन्य मशीनें भी चलाई जा सकती हैं।

देवेंद्र भाई की मृत्यु के बाद उनकी सुपुत्री डा. विभा गुप्ता ने आज भी उस मशाल को जलाए रखा है जो लाखों लोगों को राह दिखा रही है। वे तकनीकी प्रयोगों द्वारा ग्रामीण भारत में स्थायी रोजगार के निर्माण में व्यस्त हैं। समिति की अध्यक्षा डा. गुप्ता का प्रमुख योगदान है ग्राम परिवर्तन की प्रक्रियाओं से महिलाओं को जोड़ना। समिति की असली ताकत स्थानीय स्वयंसेवी समूह हैं जिनके सदस्यों की संख्या और बाजार में साख निरंतर बढ़ रही है। डा. विभा गुप्ता ने आई.आई.टी. दिल्ली से ग्रामीण महिलाओं में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण विषय पर पी.एच.डी. की है। उन्होंने कनाडा और स्वट्जरलैंड से भी कई डिग्रियां प्राप्त की हैं। वे अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं। कई आकर्षक नौकरियों को ठुकरा कर उन्होंने अपने ही गांव के लोगों के उत्थान के लिए कार्य करना स्वीकार किया है।

संपर्क : मगन संग्रहालय समिति
कुमारप्पा मार्ग, वर्धा, महाराष्ट्र – 442001
फोन : 07152-245082

Self Reliance through Green

Self Reliance through Green

In villages, 90%, water goes for irrigation. In the CAPART watershed project the challenge was enhanced availability of water in the command area. The problem was its excessive use and chemical contamination by farmers. So the focus was shifted from water to Natural Farming- an improved farming and irrigation practice that focuses on soil health; combats water waste and contamination. It focuses on increasing soil humus by scientific introduction of cow dung, cow urine, and biomass. The organic inputs, Indigenous seeds, bio-diversity and multilayer cropping help earthworms, bees, and birds to contribute in controlling pests, enhancing pollination and improving soil health.

If properly adopted, Natural Farming technology reduces water requirement by 20 to 30%. The Natural Farmer can make his own seeds, pesticides, and manure minimizing the cost of farm input. The uniqueness of this innovation is its acceptability and adaptability by a large number of farmers.

Natural Farming – It is a farming practice that uses less water, low cost organic agriculture that protects environment, earth, water, bio-diversity, livelihood, and promises sustainability.

To prevent farmers from polluting and misusing water MSS introduced Natural Farming to 2000 farmers in 20 villages. MSS also wanted to free the farmers from the clutches of money-lenders and banks from whom they had taken heavy debts to purchase hybrid seeds, chemical fertilizers and pesticides.
Unable to cope with constantly rising cost of farm inputs and decreasing crop yield, farmers are unable to pay back their debts and are compelled to commit suicide. In the state of Maharashtra from year 1995, 35,000 farmers have committed suicide. This year 712 farmers of Vidarbha region have committed suicide. Knowing that degree of dependence equals degree of exploitation, Natural Farming frees farmer from dependence on exploitative market and commercial interests. Hence, MSS volunteers initiated an awareness campaign regarding the same.
In last two years, 60 % to 80 % farmers adopted Natural Farming. Now these farmers are a proud self-reliant community, free from debt, dependence, domination, and disease.
The 2000 farmers, who shifted from chemical farming to natural farming, did without buying 2.5 Crore rupees worth of chemical fertilizers and pesticides. Instead of filling the coffers of corporate sector, this money was recycled back into the village economy. The farm productivity increased and none borrowed money from bank or moneylender. As never before, farmers not only used the water optimally but also prevented it from pollution.

Organic Farmers covered under the project     – 2000
Villages                                                             – 20
Total Area under Cultivation                              – 4678.83 acres
Total Area under Natural Farming                     – 700 acres
Crops sown in organic fields                         – Cotton, Tur, Soyabean, Linseed and Gram

BENEFITS OF NATURAL FARMING

In these villages, 60 to 80 % farmers shifted from chemical farming to Natural Farming.
Presently, 700 hectare of land is under Natural Farming.
These farmers use no chemicals and optimally utilize water.
In the first year, the productivity remained constant whereas in he second year, the production per acre increased by two to seven quintals.
The soil quality in all the 2000 farms has shown considerable improvement.
For the first time 50% farmers planted vegetable.
Initially by the month of January, the water sources use to dry up, which affected the winter crop, whereas now with ample availability of water 92% farmers had bumper crop.
Instead of one or two crops, 30 % farmers cultivated 10 to 15 varieties of crops.
All the farmers prepared farm inputs in their own farms, kept away from buying chemical farm inputs from the market, and saved Rupees 25 million.

None of the Natural Farmers borrowed money from Bank or moneylender.
BULLOCK – OPERATED WATER PUMP
Along with gaining self –sufficiency in farm inputs it was equally important for organic farmers to be self –reliant in terms of energy usage. There fore , to overcome the crisis of long and frequent power cuts, MSS installed a Bullock Water Pump. This bullock –operated pump (with three horse power capcity per hour ) draws 12,000 liters of water from a depth of 30 feet . Elight water sprinklers can operate with this bullock pump. Apart from lifting water, the prime of the pump can also be used for running other machines like a grinder, chaff cutter or generator. This pump is a combined effort of Mr. P. L. Sharma, Sultan Asalam and Mr. Vivek Chaturvedi of Kanpur, Uttar Pradesh .

Haats and Bazars

Haats and Bazars

MSS has been regularly participating various local, commercial gatherings such as haats and bazaar with the objective of achieving larger acceptances of its products.

This also helped in furthering the fine tuning of production process and has helped in establishing linkages at local level. Its efforts have achieved high percolation level, with more number of people joining the movement and taking active part in development of local entrepreneurial skills.

Karigar Panchayat

Karigar Panchayat

KARIGAR PANCHAYAT: AN ARTISAN MOVEMENT
Success of Magan Sangrahalaya’s reach under its Karigar Panchayat programme saved 200 potters from starvation. The following story illustrates how MSS facilitated preservation of their traditional market.

Ganapati, the most popular god of Maharashtra State (and all of India) is celebrated by millions using mud idols during the September festivities. During the last decade, the traditional mud idol had been replaced by the mass produced plaster of paris idols, which not only pollute the rivers and water bodies where they are immersed in large quantities after the festivities but also rob the traditional mud-idol artisans of their livelihood. In Wardha town itself, 200 artisans were on the verge of starvation due to the loss of their traditional source of income. Magan Sangrahalaya Samiti worked closely with these artisan members of the ‘Karigar Panchayat’ movement to mobilize the community, religious groups and governmental infrastructure and local business groups.

Enlightening all stakeholders about the ecologically unsound and indestructible plaster-of-paris idols and encourage the naturally disintegrating and environment-friendly mud idols which have bio-friendly solvent properties, resulting is non-degradation of water bodies during the immersion process. This was a remarkable achievement which led to re-instatement of traditional artisans’ craft and revival of their livelihoods not only in Wardha but also a large part of Maharashtra State that followed this initiative.
AIMS & OBJECTIVES

We must work towards the upliftment, development and progress of artisans.
Artisans should play a complementary role in environmental conservation and enhancement.
Karigar Panchayat must form honest, brave, healthy and progressive relationship with the society.
Karigar Panchayat should transcend the village peripheries to facilitate and strengthen the culture, art, science, wisdom and spiritual values of the entire nation.
All the decisions of Karigar Panchayat should be through consensus.
With a collective effort, Karigar Panchayat members should get rid of their ill habits, addictions and unhealthy customs.
Karigar Panchayat should form a sound understanding of policies, laws, projects and schemes impacting the artisans and disseminate them this information that leads to appropriate interventions for the benefit of the artisans, the society and the environment.

From the Chairperson

Dr. Vibha Gupta, Chair Person

Dr. Vibha Gupta is the Chairperson of Magan Sangrahalaya Samiti (MSS). She assisted her father, Dr. Devendra Kumar, in founding the Centre of Science for Villages in 1978 and has been working since then in developing appropriate technologies for rural population in areas such as renewable energy, rural artisans, housing, sanitation, forest and agro-based rural industries, health and women-oriented technologies. Qualified as an economist, Dr. Gupta earned her PHD from IIT, Delhi, with a focus on ‘Transfer of Technology Amongst Rural Women’. She also took her postgraduate degrees in Social Science in Canada and the Netherlands and is a recipient of a number of national and international awards, apart from being a member of various national committees.

Refusing lucrative jobs nationally and internationally, Dr. Vibha opted to work for the emancipation of rural folk living in our villages, especially for the women of Rural India. With her unique combination of high academic training, grounding in Gandhian philosophy and close linkage with the villages and grassroots movements, Vibha brings in the inspiration, administration and successful implementation of programmes foe enhancing entrepreneurships in rural India. We interviewed Dr.Gupta regarding her work pertaining to rural women and her philosophy of life. Presented her are a few excerpts from her interview….

Q: Why did you choose to work in this field of rural development and that too in a place which is considered as one of the poorest area in India?
I hail from a Gandhian background as my father spent his entire life to convert technologies into trades and processes into professions to create sustainable livelihoods for the millions of rural folk subsisting below the poverty line. My father bring my inspiration, I choose this filed to make his dream come true – the dream of bringing a smile on the countenance of the people living in the mud hut, especially the rural women, who are the most deprived lot.

Q: What is the vision and mission of MSS?
Our vision is to empower the people of rural India trough the micro-enterprise route to create sustainable livelihoods. And, our dream is that every villager has work in hand, has a roof over his or her head and does not sleep hungry. As you know, India’s 73% population lives in villages, of which 80% are farmers and 20% are artisans, of these 50% are women. These subgroups are in dire need of alternate means of sustenance, given the market forces and today’s economic policies. Magan Sangrahalaya Samithi’s mission is to address these critical needs by creating sustainable, low-cost, environmentally sound and socially just interventions.

Q: How is CAPART helping MSS archives its mission?
CAPART has been and is extending tremendous support in fulfilling our mission trough its projects that we are implementing in 120 villages of Wardha District of Maharashtra, especially in terms of watershed harvesting and rural enterprises. CAPART – funded Watershed Management and Development project has helped us bring water to ten arid villages by recharging their groundwater aquifer and rejuvenating the natural resources base through implementation of appropriate rainwater harvesting technologies. Now, there is water in every home and every field, whereas previously there was none. This intervention has also helped mobilize 2000 farmers to do natural farming, saving a total of Two Crore rupees annually on chemical fertilizers, resulting in an increase of 25 to 50% in the crop yield. Regarding the Rural Enterprise project of CAPART, it has helped us from around 600 Self Help Groups (SHGs) with more than 10,000 women members. In fact, we have set up 34 rural micro-enterprises that provide subsidiary employment to 1000 rural women.

Q: What should be CAPART’s role in strengthening the grassroots movement?
CAPRT, with its vast network of 4000 voluntary agencies including Technology Resource Centres, Support Voluntary Agencies, specialized technical teams, should work towards evolving alternative innovative models of sustainable development and helping multiply and replicate them across the nation.

Genesis

Genesis

GENESIS
Gandhiji settled in Maganwadi, Wardha, after his departure from Sabarmati Ashram in Ahmedabad. He named this Ashram after Maganlal Gandhi, his close associate and a rural scientist who had been his right hand in all the earlier three Ashrams but who suddenly died while working, at his behest, in Bihar in 1928.

Dedicated to the cause of village industries Gandhiji founded the All India Village Industries Association (AIVIA) by a resolution of the All India Congress Committee on 26th October 1934.

Towering national personalities like Gurudev Rabindranath Tagore, renowned humanist and international scientists like Shri.C.V.Raman and Prof. Jagadish Chandra Bose, Shri P.C.Ray and prominent industrialist Shri G.D.Birla were part of the advisory board of AIVIA.

Gandhiji himself as the chairman, with Kumarappaji as the secretary of AIVIA, undertook the foremost all India movement of revival and expansion of various rural industries, Khadi and artisans based crafts. AIVIA evolved, developed, and disseminated rural industries as well as trained several organizations and artisans.

LAYING FOUNDATION FOR ENTREPRENEURSHIP DEVELOPMENT
On 30th December 1938 Gandhiji innograted Magan Sangrahalaya – The very first museum of Rural Industries and Khadi. He wanted it to be a dynamic window on evolving technicques in rural industrialization and a centre of education for the common person to impart information on new modes of production which could help the poor of the land.

Dr. Devendra Kumar, a young Oil technologist, joined AIVIA from 1949 to 1952 as a scientist and undertook the onus of providing momentum to the noble cause of helping those below the poverty line by empowering them with the tool of science and technology.

In 1978, Devendra Bhai (which was his popular name) made Magan Sanghralaya his base and took up the mission to create a new awareness pertaining to Gandhian values among the scientists, technologists, economists, sociologists and experts in various disciplines all over the country. Here he set up the Center of Science for villages. His entire life was nothing but a relentless pursuit to provide a human face to technology with the dream that no one slept hungry and every citizen of India became self sufficient and lead a life of dignity and honor.

THE THRUST- BUILDING TECHNOLOGICAL COMPETENCIES
The main objective of Magan Sangrahalaya Samiti (MSS) is to bring to the fore indigenous skills of the village artisans, stemming from the accumulated traditional knowledge, and facilitate its interaction with the recent knowledge of science and technology. To innovate technologies that could be converted into sustainable business opportunities at the grassroots level.

The other objectives are research, development and dissemination of Khadi and village industries, agriculture, dairy etc. alongwith the display and demonstrate of their production processes.
DEVENDRA BHAI: THE CRUSADER
Dr. Devendra Kumar, popularly known as Devendra Bhai, was hailed as the doyen of Appropriate Technology in India.

A science graduate from Lucknow University and an Oil Technologist from the famous Harcourt Butler Technological Institute, Devendra Bhai left a lucrative job to join the Gandhian Movement in 1946. Influenced by the Gandhian economic philosophy of decentralization, he joined the All India Village Industries Association (AIVIA), of which Mahatma Gandhi was the president and Prof.J.C. Kumarappa was the secretary. Prof. Kumarappa was a great Gandhian Economist, who influenced Gandhiji to initiate the ‘Namak Satyagraha’ (or the famous ‘Salt Movement’) against the British Raj.

Devendra Bhai helped his Guru Kumarappaji for six years in research and innovative experiments in various village industries he also edited and translated his books as well as articles, which Gandhiji hailed as the best analysis of the village economy of India and called Kumarappa the ‘Doctor of Village Industries’.

Guiding people to self sufficiency
In 1952, Devendra Bhai opted to live with the landless poor of a small insulated hilly village, called ‘Machala’, near Indore in Madhya Pradesh for eight long years – to experience village life in the raw. He made a sea change in the lives of the rural people of Machala who still revere him as a saint who changed their lives by making them self-sufficient to lead a life of dignity and honour. He was also a part of the ‘Bhoodan’ movement (where big land owners donated land to the landless poor) spearheaded by Vinoba Bhave – the barefoot ‘Saint on the march’. Under Vinobaji’s guidance, Devendra Bhai acted as the state level organizer of Bhoodan and was also active in Sarvodaya and village movements.

Catalyzing policy initiatives
In 1965, Devendra Bhai was invited to become the Secretary of the National Gandhi Memorial Trust at New Delhi and was made the Organizing Secretary of the National Committee for Gandhi Centenary of which the President of India was the President and the Prime Minister of India Chairperson. He initiated a number of institutions and was connected to various national and international committees on Gandhian constructive movement. Devendra Bhai acted as a vital link between the grassroots NGOs in the Gandhian field and the policy makers at the Central Government level. He was involved in organizing important meetings with the Prime Minister and the concerned ministers on various issues. He was also instrumental in cultivating a number of scientific institutions in Delhi to orient them towards rural needs. Even the concept of having Rural Development and Appropriate Technology cells at all the IITs in India, was the brainchild of Devendra Bhai. Not many people are aware that he was the person who helped in the formulation of the Council for Advancement of Rural Technology (CART) – the erstwhile CAPART. He was a member of around 150 national Science & Technology committees.

Transforming Rural Life with Technology
In 1978, Devendra Bhai took up the mission of his Guru – Kumarappa – of taking the benefits of technology to the rural poor and initiated the Centre of Science for Villages (CSV) at Magan Sangrahalaya. Wardha. With a team of committed scientists and technocrats, CSV developed 75 technologies to convert them into business opportunities for the rural people and constructed 30,000 low-cost mud houses, 100,000 hygienic toilets, 20,000 biogas plants and trained around 30,000 rural artisans in improved scientific techniques ( like non-violent honey extraction, gum-collection without harming the trees, single-bullock driven agricultural equipment and improved potter’s wheel). In fact, he started a major artisan movement called ‘Karigar Panchayat’, creating artisan guilds in 22 states of India with a total strength of 200, 000 artisans.

Light that continues to Enlighten
Though Devendra Bhai is no more in this world, his daughter – Dr Vibha Gupta – is carrying on the torch by creating sustainable livelihoods in Rural India through technological interventions. She has been working with Devendra Bhai since 1978 and is currently the Chairperson of the Magan Sangrahalaya Samiti.